आज की बहुध्रुवीय दुनिया में भारत एक कूटनीतिक धुरी के रूप में स्थापित हो चुका है। किसी भी एक वैश्विक गुट का अंधानुकरण करने के बजाय भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है। इस व्यावहारिक नीति ने वैश्विक स्तर पर देश के सम्मान और विश्वसनीयता को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया है।
ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज़
विकासशील देशों के हितों की रक्षा करने में भारत ने हमेशा अग्रणी भूमिका निभाई है। हाल के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत ने अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों की चिंताओं को प्रमुखता से उठाकर खुद को ग्लोबल साउथ के एक स्वाभाविक नेता के रूप में पेश किया है। कूटनीति की यह दिशा विश्व व्यवस्था को और अधिक समावेशी बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।
रणनीतिक स्वायत्तता की सफलता
चाहे ऊर्जा संकट हो या रक्षा सौदे, भारत ने बिना किसी बाहरी दबाव के अपने फैसले खुद लिए हैं। पश्चिमी देशों और यूरेशियन शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने की यह क्षमता भारत की परिपक्व कूटनीति का प्रमाण है। आने वाले दशकों में यह रणनीतिक स्वायत्तता ही भारत को विश्व पटल पर एक निर्णायक शक्ति बनाए रखेगी।
